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आनन्द की तलाश

 आनन्द की तलाश  रेखाएं उकेरती जाती है रोज़ ज़िन्दगी बार बार न देख उदास उदास, कोई चित्र खींच चित्रकार  भोर मिली थी हँसते हुए, साँय मदमाती सो गई नैनों से कुछ बात कर, देख कुछ चितवन के पार  मुस्कान बिखेर गया तो किसी ने मन मसल दिया मधुर लम्हों को याद कर, दिल किया जब निसार पुष्प सी महक उठी तो कभी बेइंतहा रूठी मिली  नज़र उठा के प्यार कर, उलझी हुई ज़ुल्फ़ सँवार  कभी गहन जंगल मिले, कहीं रास्ते हँसते दिखे  नई ख़ुशियां तलाश कर , पतझड़ के पार है बहार कोई कड़ुए बोल बोल गया, कोई नज़र चुरा गया क्रोध का न इज़हार कर, बढ़ता जा भँवर के पार मतलब की दुनिया मिली, मतलब की महफ़िलें  सहज न विश्वास कर, मतलबी मिलेंगे बहुत यार अमृत छलकता था हॄदय में, व्यर्थ ही बैरागी हुए चल चल कर थक गए, न जा सके बंधन के पार © हरीश ममगाई 

प्यार

  प्यार     प्यार क्या है सोचता हूँ  चलते हुए क़दमों की मस्ती  या मन मे घुलती मिठास  आँखों मे निखरती हुई बहार  या दिल मे एक गहरा सुकून  तन मे छाई मखमली सांझ  इठलाके उतरता हसीन झरना  प्यार तू चुपके से आता है  सब चैन चुरा लेता है  तू सर्पीली पहाड़ी सड़क है  या मदमस्त कोई झील  तू एक भरपूर नींद है  या सुहाना कोई स्वप्न  तुझे अब क्या नाम दूं  तू अनंत की डोर है  तूने ही सबको पिरोया हुआ  तू ही रात, तू ही भोर है  तेरा ठिकाना है सब जगह  तेरा जलवा सब ओर है  © हरीश ममगाईं   

प्रेम

  प्रेम प्रेम गूढ़ छंदों में लिखे हुए नहीं शब्द कोई न आसमानों में बहुत ऊँची उड़ान समझो कल्पनाओं में प्रिय को कस लेना नहीं है न मनोहर अलंकारों के भार से लाद देना न भव्य भवनों में झूलों की अठखेलियाँ है और न महँगे परिधान का आवरण किंचित् हॄदय की हॄदय से मौन वार्ता को प्रेम मानो मन का मन से कस गया अवगुंठन मधुर है खिलती हुई सरल मृदु मुस्कान अधरों पर एकांत में चुपके से चुराई चंचल शरारत है आवेग में नयनों में सिमट आ गयी जलराशि विस्मृत होकर कुछ क्षणों का हास उन्मुक्त है दूर रहकर भी निरंतर निकट होते रहते जाना कंधे पर हौले से रखे हाथ का कोमल स्पर्श है साथ साथ राह चलते हुए क़दमों की आहट यह संसार के कोलाहल से छीना हुआ पल है © हरीश ममगाई