प्रेम

 

प्रेम

प्रेम गूढ़ छंदों में लिखे हुए नहीं शब्द कोई
न आसमानों में बहुत ऊँची उड़ान समझो
कल्पनाओं में प्रिय को कस लेना नहीं है
न मनोहर अलंकारों के भार से लाद देना
न भव्य भवनों में झूलों की अठखेलियाँ है
और न महँगे परिधान का आवरण किंचित्
हॄदय की हॄदय से मौन वार्ता को प्रेम मानो
मन का मन से कस गया अवगुंठन मधुर है
खिलती हुई सरल मृदु मुस्कान अधरों पर
एकांत में चुपके से चुराई चंचल शरारत है
आवेग में नयनों में सिमट आ गयी जलराशि
विस्मृत होकर कुछ क्षणों का हास उन्मुक्त है
दूर रहकर भी निरंतर निकट होते रहते जाना
कंधे पर हौले से रखे हाथ का कोमल स्पर्श है
साथ साथ राह चलते हुए क़दमों की आहट
यह संसार के कोलाहल से छीना हुआ पल है

© हरीश ममगाई


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

प्यार

कशमकश