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बेटी

बेटी क्या बताएं कैसी होती हैं बेटियाँ ख़ुद की जान से प्यारी होती हैं बेटियाँ फूलों की पंखुड़ियों सी होती हैं बेटियाँ हॄदय की धड़कन सी थिरकती हैं बेटियाँ दूर होती हैं तो बहुत याद आती हैं बेटियाँ माँ को मन का हर राज़ बताती हैं बेटियाँ पिता के हर दर्द को हर लेती हैं बेटियाँ घर घर को फूलों सा महकाती हैं बेटियाँ पँख फैला कर आसमाँ छू लेती हैं बेटियाँ संसार में स्वयं को ख़ूब चमकाती हैं बेटियाँ प्यार को सीने में संजोए रखती हैं बेटियाँ सम्मुख निर्झर सी खिलखिलाती हैं बेटियाँ ख़ुश रहें तो मन में अमृत बरसाती हैं बेटियाँ व्यथित यदि हों तो बहुत रुलाती हैं बेटियाँ आवाज़ दो तो तुरंत दौड़ पड़ती हैं बेटियाँ सुख दुःख हर राह में मौजूद रहती हैं बेटियाँ क्यों लोग कहते हैं परायी हो जाती हैं बेटियाँ दिल के दरीचे के पास सदा रहती हैं बेटियाँ © हरीश ममगाईं 

नीड़

नीड़ फिर वापस लौट कर निज नीड़ आना है चिड़ियों का प्यारा दरख़्त ही ठिकाना है पँख जब आये थे उमंग बड़ी निराली थी आसमानों से भी ऊपर उड़ने की ठानी थी दाने पर्याप्त हैं पास , उदर तृप्त हो जाएगा रहो यहीं पास , वक़्त मज़े में गुज़र जाएगा इन शोख़ हवाओं की गोद में खेलते रहो निर्झर के बहते नीर में तुम फुदकते रहो बहुत कहा किन्तु चिड़ियाँ कहाँ मानती उड़ उड़ कर दूर दूर और बहुत दूर जाती कितनी सुबहें कितनी शामें यूँ ही बीत जाती कभी यहाँ कभी वहाँ रुक रुक न लौट पाती पँख शिथिल पग दुर्बल, अब वो ऊर्जा कहाँ नीड़ आता बहुत याद,  रहते हों चाहे जहाँ पुनः वो दरख़्त की टहनियों से लिपट रोयीं दो तीन रातें अपने आसमान के नीचे सोयीं ये मिट्टी, ये पत्थर, ये प्यारी प्यारी सी  राहें रुक रुक कर देखती हैं सब प्यासी निगाहें फिर उड़ चली हैं चिड़ियाँ भिन्न भिन्न दिशायें जो सुकून कुछ वक़्त मिला ,और कहाँ पायें यूँ ही कशमकश में पूरी ज़िंदगी निकल जायेगी किन्तु ऐ प्यारे दरख़्त तेरी याद बहुत आयेगी © हरीश ममगाई

बसंत

बसंत मुस्कुराते हैं फूल सब ओर कि बसंत आया है उन्मुक्त है हर सांस सांस कि बसंत आया है खुल गए मन के अवगुंठन कि बसंत आया है देखने दो बहार बार बार कि बसंत आया है करूँगा जो मेरा मन कहे कि बसंत आया है मस्त है हॄदय का तार तार कि बसंत आया है खुल कर कहूँगा प्रिय उद्गार कि बसंत आया है सेमल के रंग गए गाल गाल कि बसंत आया है उड़ रही आनन्द की फुहार कि बसंत आया है आँखों में स्वप्न हज़ार हज़ार कि बसंत आया है चलती है मनमुग्ध बयार कि बसंत आया है पग मचलते हैं बार बार कि बसंत आया है मन में न रहे शिकवे बेकार कि बसंत आया है मुहब्बत में आँखें चार चार कि बसंत आया है बस गया मन में हर्षोल्ल्लास कि बसंत आया है प्रकृति के गले में हार हार कि बसंत आया है © हरीश ममगाई

सफ़र

सफ़र बहुत कुछ जानने की चाहत कभी कहीं का नहीं छोड़ती सैलाब में बहती रहे कुछ पल जीवन की नैया तो अच्छा है कहीं मुस्कानें ही क़ातिल हैं कभी अजनबी मुख़ातिब हैं कहीं फंदों के पार आज़ादी बच निकल जाएँ तो अच्छा है कहीं शोर करने से आफ़त है कभी चुप रहना है नादानी ज़माना सबको छकाता है सफ़र कट जाय तो अच्छा है कोई देहरी पर मायूस है बैठा कहीं बियाबानों में मस्ती है सभी बढ़ रहे हैं अपनी राहों में सम्भल कर जाएँ तो अच्छा है *हरीश ममगाईं*

कशमकश

कशमकश जब ज़िन्दगी की कशमकश ने हैरान कर दिया मन को अपने किसी तरह से तैयार कर लिया हमराह थे जो हाथ छुड़ा कर कहीं दूर जा बसे राहों के फूल पत्थरों से हमने प्यार कर लिया चाँद सितारों की महफ़िलें रोज़ लगती ही रहीं थोड़ा सा सिरहाना खिड़की के पास कर लिया दरवाज़े पर दस्तक की बाट कब तक जोहते ख़ुशनुमा यादों में अपना टाइम पास कर लिया *हरीश ममगाईं *