सफ़र

सफ़र

बहुत कुछ जानने की चाहत
कभी कहीं का नहीं छोड़ती
सैलाब में बहती रहे कुछ पल
जीवन की नैया तो अच्छा है
कहीं मुस्कानें ही क़ातिल हैं
कभी अजनबी मुख़ातिब हैं
कहीं फंदों के पार आज़ादी
बच निकल जाएँ तो अच्छा है
कहीं शोर करने से आफ़त है
कभी चुप रहना है नादानी
ज़माना सबको छकाता है
सफ़र कट जाय तो अच्छा है
कोई देहरी पर मायूस है बैठा
कहीं बियाबानों में मस्ती है
सभी बढ़ रहे हैं अपनी राहों में
सम्भल कर जाएँ तो अच्छा है

*हरीश ममगाईं*

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