नीड़
नीड़
फिर वापस लौट कर निज नीड़ आना है
चिड़ियों का प्यारा दरख़्त ही ठिकाना है
पँख जब आये थे उमंग बड़ी निराली थी
आसमानों से भी ऊपर उड़ने की ठानी थी
दाने पर्याप्त हैं पास , उदर तृप्त हो जाएगा
रहो यहीं पास , वक़्त मज़े में गुज़र जाएगा
इन शोख़ हवाओं की गोद में खेलते रहो
निर्झर के बहते नीर में तुम फुदकते रहो
बहुत कहा किन्तु चिड़ियाँ कहाँ मानती
उड़ उड़ कर दूर दूर और बहुत दूर जाती
कितनी सुबहें कितनी शामें यूँ ही बीत जाती
कभी यहाँ कभी वहाँ रुक रुक न लौट पाती
पँख शिथिल पग दुर्बल, अब वो ऊर्जा कहाँ
नीड़ आता बहुत याद, रहते हों चाहे जहाँ
पुनः वो दरख़्त की टहनियों से लिपट रोयीं
दो तीन रातें अपने आसमान के नीचे सोयीं
ये मिट्टी, ये पत्थर, ये प्यारी प्यारी सी राहें
रुक रुक कर देखती हैं सब प्यासी निगाहें
फिर उड़ चली हैं चिड़ियाँ भिन्न भिन्न दिशायें
जो सुकून कुछ वक़्त मिला ,और कहाँ पायें
यूँ ही कशमकश में पूरी ज़िंदगी निकल जायेगी
किन्तु ऐ प्यारे दरख़्त तेरी याद बहुत आयेगी
© हरीश ममगाई
फिर वापस लौट कर निज नीड़ आना है
चिड़ियों का प्यारा दरख़्त ही ठिकाना है
पँख जब आये थे उमंग बड़ी निराली थी
आसमानों से भी ऊपर उड़ने की ठानी थी
दाने पर्याप्त हैं पास , उदर तृप्त हो जाएगा
रहो यहीं पास , वक़्त मज़े में गुज़र जाएगा
इन शोख़ हवाओं की गोद में खेलते रहो
निर्झर के बहते नीर में तुम फुदकते रहो
बहुत कहा किन्तु चिड़ियाँ कहाँ मानती
उड़ उड़ कर दूर दूर और बहुत दूर जाती
कितनी सुबहें कितनी शामें यूँ ही बीत जाती
कभी यहाँ कभी वहाँ रुक रुक न लौट पाती
पँख शिथिल पग दुर्बल, अब वो ऊर्जा कहाँ
नीड़ आता बहुत याद, रहते हों चाहे जहाँ
पुनः वो दरख़्त की टहनियों से लिपट रोयीं
दो तीन रातें अपने आसमान के नीचे सोयीं
ये मिट्टी, ये पत्थर, ये प्यारी प्यारी सी राहें
रुक रुक कर देखती हैं सब प्यासी निगाहें
फिर उड़ चली हैं चिड़ियाँ भिन्न भिन्न दिशायें
जो सुकून कुछ वक़्त मिला ,और कहाँ पायें
यूँ ही कशमकश में पूरी ज़िंदगी निकल जायेगी
किन्तु ऐ प्यारे दरख़्त तेरी याद बहुत आयेगी
© हरीश ममगाई
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