बसंत

बसंत

मुस्कुराते हैं फूल सब ओर कि बसंत आया है
उन्मुक्त है हर सांस सांस कि बसंत आया है
खुल गए मन के अवगुंठन कि बसंत आया है
देखने दो बहार बार बार कि बसंत आया है
करूँगा जो मेरा मन कहे कि बसंत आया है
मस्त है हॄदय का तार तार कि बसंत आया है
खुल कर कहूँगा प्रिय उद्गार कि बसंत आया है
सेमल के रंग गए गाल गाल कि बसंत आया है
उड़ रही आनन्द की फुहार कि बसंत आया है
आँखों में स्वप्न हज़ार हज़ार कि बसंत आया है
चलती है मनमुग्ध बयार कि बसंत आया है
पग मचलते हैं बार बार कि बसंत आया है
मन में न रहे शिकवे बेकार कि बसंत आया है
मुहब्बत में आँखें चार चार कि बसंत आया है
बस गया मन में हर्षोल्ल्लास कि बसंत आया है
प्रकृति के गले में हार हार कि बसंत आया है

© हरीश ममगाई

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

प्रेम

प्यार

कशमकश