आनन्द की तलाश

 आनन्द की तलाश 


रेखाएं उकेरती जाती है रोज़ ज़िन्दगी बार बार

न देख उदास उदास, कोई चित्र खींच चित्रकार 

भोर मिली थी हँसते हुए, साँय मदमाती सो गई

नैनों से कुछ बात कर, देख कुछ चितवन के पार 

मुस्कान बिखेर गया तो किसी ने मन मसल दिया

मधुर लम्हों को याद कर, दिल किया जब निसार

पुष्प सी महक उठी तो कभी बेइंतहा रूठी मिली 

नज़र उठा के प्यार कर, उलझी हुई ज़ुल्फ़ सँवार 

कभी गहन जंगल मिले, कहीं रास्ते हँसते दिखे 

नई ख़ुशियां तलाश कर , पतझड़ के पार है बहार

कोई कड़ुए बोल बोल गया, कोई नज़र चुरा गया

क्रोध का न इज़हार कर, बढ़ता जा भँवर के पार

मतलब की दुनिया मिली, मतलब की महफ़िलें 

सहज न विश्वास कर, मतलबी मिलेंगे बहुत यार

अमृत छलकता था हॄदय में, व्यर्थ ही बैरागी हुए

चल चल कर थक गए, न जा सके बंधन के पार


© हरीश ममगाई 









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